रविवार, 17 फ़रवरी 2013

समुन्द्र्कूप

इलाहाबाद के इस अनोखे कुंड में होता है सात
समुद्रों का मिलन
संगम नगरी इलाहाबाद में केवल तीन नदियों के
पानी का ही नहीं, ब्लकि सात समुंद्र के
पानी का मिलन भी होता है। यह सुनने मे ज़रूर
अजीब है पर यह सच है। इलाहाबाद मे एक
ऐसा कुंआ है जो कई हज़ार साल पुराना है और
सैकड़ों फीट गहरा है। पुराणों में यह वर्णन
मिलता है कि इस कुंए मे सात समुद्रों का जल
आकर मिलता है। वर्तमान में यह कूप गंगा के
किनारे एक विशाल, उंचे टीले पर स्थित है।
इस कूप का व्यास लगभग 22 फीट है।
पत्थरों से बने इस कूप के जगत पर विष्णु
का पदचाप एवं शिवजी की मूर्ति है। इस कूप
को समुद्र कूप की संज्ञा दी गई है। समुद्रकूप
का पूरा परिसर 10 से 12 फीट ऊंची ईंट
की चहारदीवारी से घिरा है। समुद्रकूप के पास
एक आश्रम भी है जहां यह वर्णन मिलता है
कि द्वापर युग मे पांडव लाक्षागृह से बचने के
बाद यहां आए थे।
पद्म पुराण और भागवत पुराण मे यह वर्णन
मिलता है कि कई ह़जार वर्ष पहले चंद्र वंश के
पहले पुरुष राजा पुरुरवा ने इलाहाबाद के समीप
गंगा नदी के किनारे प्रतिष्ठान पुरी नामक नगर
बसाया था। जो वर्तमान मे झूंसी कहलाता है।
उन्होंने कई 100 सालों तक यही रह कर
अपना शासन किया। उनके शासन के दौरान
स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी भी उनके साथ करीब
100 साल तक उनके साथ यहीं रही।
उर्वशी को ऋषि दुर्वासा ने तप मे बाधा उत्पन
करने के कारण मृत्युक लोक मे रहने का श्राप
दिया था। इन्ही राजा पुरुरवा और
उर्वशी की संतान से चंद्र वंश चला और
इशी चंद्र वंश की 65 कडी मे भगवान् कृष्ण ने
जन्म लिया।
उन्ही राजा पुररवा ने ही इस समुद्र कूप
का निर्माण करवाया था। राजा ने कई यज्ञ और
अनुष्ठान के लिए सातों समुद्रों का आह्वान इस
कूप मे किया था। तभी से इस कूप मे
सातों समुंदरों का जल पाया जाता है। इस कूप
का कुल व्यास करीब 22 मीटर का है
तथा इसकी गहराई के बारे मे कोई
अंदाजा नही लगया जा सकता। ऊपर से देखने पर
यह करीब 100 फीट गहरा दिखाई देता है। पर
जिन लोगों ने इस कुए में प्रवेश किया है,
उनका मानना है कि इस कुएं की सतह पर एक
लोहे का तवा रखा हुआ है, जिसके अन्दर ना जाने
कितना और गहरा इसका स्रोत है। इस कूप के
चारो तरफ़ 10 से 12 फीट उची दीवार है।
गंगा नदी के किनारे होने के बावजूद आज भी इस
कुंए का पानी समुद्र के पानी की तरह खारा है
जिससे यह साबित होता है कि इस कूप मे समुद्र
का जल है।
इस समुद्र कूप के पुजारी महंत बाल कृष्ण कहते
है कि इस समुद्र कूप का वर्णन पद्म पुराण और
मत्स्य पुराण में भी मिलता है। जब द्वापर युग मे
पांचो पांडव लाक्षा गृह से बच के आए थे
तो उन्होंने यही पर रह कर इस कुंए के जल से
अश्वमेघ यज्ञ किया था। यहीं से उनकी विजय
के लिए ब्रह्मा जी ने उन्हे वरदान दिया था।
पद्म पुराण मे यह वर्णन भी मिलता है कि एक
मुनि ने इस कूप के बारे मे युधिष्ठि्र
को बताया था।
यह वर्णन मिलता है कि इस कूप के किनारे
ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए क्रोध को शांत
करके तीन रात तक यहां विश्राम कर ले तो उसके
सब पाप कट जाते हैं। इसके जल का आचमन करने
से परमपद की प्राप्ति होती है।
इस कूप के बारे मे मत्स्य पुराण मे
भी लिखा गया है कि प्रतिष्ठान पुरी में एक महान
कूप है जिसके दर्शन मात्र से मनुष्य पाप रहित
हो जाता है। अमावस्या पूर्णिमा और चंद्रग्रहण
के समय इस कूप की परिक्रमा से
पृथ्वी की परिक्रमा का फल मिलता है। यहां पर
स्नान दान करने से यश प्राप्त होता है और अंत
में इंसान स्वर्ग को प्राप्त होता है। कहा जाता है
कि महाकुम्भ में संगम किनारे कल्पवास करने
की बाद अगर इस समुन्द्र्कूप के दर्शन नहीं किए
जाये तो कल्पवास का सारा फल व्यर्थ
हो जाता है।

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

संस्कार

एक किसान का बेटा मुंबई पढने चला गया वहा उसको मॉडल लड़की से प्रेम हो गया जो पूरी तरह से वेस्टर्न संस्कृति में लिपि पुती थी कुछ
दिनों के बाद लड़के को एहसास हो गया की यो मेल न हो सकता और उसने लड़की को पत्र लिखा ----------)(->

ओ कंप्यूटर युग की छोरी मन की काली तन की गोरी करना मुझको माफ़ मैं तुम्हे प्यार नही करपाउँगा 
तू फैशन tv सी लगती मैं संस्कार काचेनल हूँ
तू मिनरल पानी की बोतल लगती है मैं गंगा का पावन जल हू
तुम लाखो की गाड़ी में चलने वाली मैं पाव पाव चलने वाला
तुम हलोजन सी जलती हो मैं दीपक सा जलने वाला
करना मुझको माफ़ मैं तुम्हे प्यार नही कर पाउँगा

तुम रैंप पर देह दिखाती हो मैं संस्कार को जीता हू
जब तुम्हे देख कर सिटी बजती मैं घुट लहू का पीता हूँ
तुम सूप पीने वाली मैं मैठा पीने वाला
तुम शॉक अलार्म से भी ना डरो मैं पॉपकॉर्न से डरने वाला
तुम डिस्को की धुन पर नाचो मैं राम नाम ही जबता हूँ
तुम पीता जी को डैड और टेलीफोन को भी डैड कहो और
माँ को मम्मी(mummy) बुलाती हो
तुम करवा चौथ भूल बैठी और वेलन टाइम डे मनाती हो
तुम पॉप म्यूजिक की धुन सी बजती मैं बंसी की धुन का धनिया
मुझ से डॉट कॉम भी ना लगती तुम इंटरनेटी दुनिया
तुम मोबाइल पर मेसेज लिखने वाली मैं पोस्टकार्ड लिखने वाला
तुम राकेट सी लगती हो और मैं उड़ने वाला गुब्बारा सा
तू अपना सब कुछ हार चुकी मैं जीता हुआ जुआरी हूँ
तुम इटली की रानी जैसी मैं देसी अटल बिहारी ह

स्वर्णिम हिंद का स्वर्णिम स्वप्न(सोमनाथ मंदिर का इतिहास::--)

सोमनाथ मंदिर का इतिहास::--
मंदिर का बार-बार खंडन और जीर्णोद्धार
होता रहा पर शिवलिंग यथावत रहा। लेकिन सन
1026 में महमूद गजनवी ने जो शिवलिंग खंडित
किया, वह वही आदि शिवलिंग था। इसके बाद
प्रतिष्ठित किए गए शिवलिंग को 1300 में
अलाउद्दीन की सेना ने खंडित किया। इसके बाद
कई बार मंदिर और शिवलिंग खंडित किया गया।
बताया जाता है आगरा के किले में रखे देवद्वार
सोमनाथ मंदिर के हैं। महमूद गजनवी सन 1026
में लूटपाट के दौरान इन द्वारों को अपने साथ ले
गया था। सोमनाथ मंदिर के मूल मंदिर स्थल पर
मंदिर ट्रस्ट द्वारा निर्मित नवीन मंदिर स्थापित
है। राजा कुमार पाल द्वारा इसी स्थान पर अंतिम
मंदिर बनवाया गया था।
सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री उच्छंगराय नवल शंकर ने
19 अप्रैल 1940 को यहां उत्खनन कराया था।
इसके बाद भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने
उत्खनन द्वारा प्राप्त ब्रह्माशिला पर शिव
का ज्योतिर्लिग स्थापित किया है। सौराष्ट्र के
पूर्व राजा दिग्विजय सिंह ने 8 मई 1950
को मंदिर की आधार शिला रखी तथा 11 मई
1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ.
राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर में ज्योतिर्लिग स्थापित
किया। नवीन सोमनाथ मंदिर 1962 में पूर्ण
निर्मित हो गया। 1970 में जामनगर
की राजमाता ने अपने स्वर्गीय पति की स्मृति में
उनके नाम से दिग्विजय द्वार बनवाया। इस
द्वार के पास राजमार्ग है और पूर्व
गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा है।
सोमनाथ मंदिर निर्माण में पटेल का बड़ा योगदान
रहा।
मंदिर के दक्षिण में समुद्र के किनारे एक स्तंभ
है। उसके ऊपर एक तीर रखकर संकेत
किया गया है कि सोमनाथ मंदिर और दक्षिण
ध्रुव के बीच में पृथ्वी का कोई भूभाग नहीं है।
मंदिर के पृष्ठ भाग में स्थित प्राचीन मंदिर के
विषय में मान्यता है कि यह पार्वती जी का मंदिर
है। सोमनाथजी के मंदिर की व्यवस्था और
संचालन का कार्य सोमनाथ ट्रस्ट के अधीन है।
सरकार ने ट्रस्ट को जमीन, बाग-बगीचे देकर
आय का प्रबंध किया है। यह तीर्थ पितृगणों के
श्राद्ध, नारायण बलि आदि कर्मो के लिए
भी प्रसिद्ध है। चैत्र, भाद्र, कार्तिक माह में
यहां श्राद्ध करने का विशेष महत्व
बताया गया है। इन तीन महीनों में
यहां श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ लगती है। इसके
अलावा यहां तीन नदियों हिरण, कपिला और
सरस्वती का महासंगम होता है। इस
त्रिवेणी स्नान का विशेष महत्व है।
'' हर हर महादेव ''

स्वर्णिम हिंद का स्वर्णिम स्वप्न'

आप माने या न माने लेकिन हमारे देश में मरने के बाद भी तीन दशकों से एक सिपाही सरहदों की रक्षा कर रहा है।
इस सिपाही को अब लोग कैप्टन बाबा हरभजन सिंह के नाम से पुकारते हैं।
4 अक्टूबर 1968 में सिक्किम के साथ लगती चीन की सीमा के साथ नाथुला पास में गहरी खाई में गिरने से मृत्यु हो गई थी।
लोगों का ऐसा मानना है कि तब से लेकर आज तक यह सिपाही की आत्मा सरहदों की रक्षा कर रही है।
इस बात पर हमारे देश के सैनिकों को पूरा विश्ववास तो है ही लेकिन चीन के सैनिक भी इस बात को मानते हैं
क्योंकि उन्होंने कैप्टन बाबा हरभजन सिंह को मरने के बाद घोड़े पर सवार होकर सरहदों की गश्त करते हुए देखा है।
कैप्टन हरभजन सिंह का जन्म 3 अगस्त 1941 को पंजाब के कपूरथला जिला के ब्रोंदल गांव में हुआ था।
उन्होंने वर्ष 1966 में 23वीं पंजाब बटालियन ज्वाइन की थी।
वह सिक्किम जब 4 अक्टूबर 1968 में टेकुला सरहद से घोड़े पर सवार होकर अपने मुख्यालय डेंगचुकला जा रहे थे
तो वह एक तेज बहते हुए झरने में जा गिरे और उनकी मौत हो गई।
उन्हें पांच दिन तक जीवित मानकर लापता घोषित कर दिया गया था।
पांचवें दिन उनके साथी सिपाही प्रीतम सिंह को सपने में आकर मृत्यू की जानकारी दी और बताया की उनका शव कहां पड़ा है।
उन्होंने प्रीतम प्रीतम सिंह से यह भी इच्छा जाहिर की कि उनकी समाधि भी वहीं बनाई जाए।
पहले प्रीतम सिंह कि बात का किसी ने विश्वास नहीं कि
लेकिन जब उनका शव उसी स्थल पर मिला जहां उन्होंने बताया था तो सेना के अधिकारियों को उनकी बात पर विश्वास हो गया।
और सेना के अधिकारियों ने उनकी छोक्या छो नामक स्थान पर उनकी समाधि बना डाली।
उनके आज भी रात को ही जवान वर्दी को प्रेस कर देते हैं उनके जूतों को पॉलिश कर दिया जाता है
क्योंकि ऐसी धारणा है कि उन्हें सुबह सरहद पर डयूटी पर जाना होता है।
उनके कमरे में रोजाना सफाई की जाती है
सरकार ने उन्हें मृत न घोषित करते हुए उनकी सेवाओं को जारी रखा
उनके परिवार के सदस्यों को पेंशन नहीं मिलती थी उनका वेतन उनके घर बाकायदा फौज के जवान देकर जाते थे।
मरने के बाद बाबा कैप्टन बाबा को सेना के अधिकारियों ने सिपाही से पदोन्नत कर कैप्टन बना दिया।
वह किसी न किसी तरह सीमा के पार होने वाली गतिविधियों की जानकारी आज भी सेना के अधिकारियों को दे देते हैं।
अब काफी समय के बाद सेना ने उनका वेतन बंद कर दिया है।
हालांकि उनकी समाधि पर चढऩे वाला चढ़ावा उनके घर आज भी भिजवा दिया जाता है।
हर वर्ष उन्हें 15 सितंबर से 15 नंवबर तक वार्षिक छुट्टी पर जाना होता है।
इस दौरान फौज के दो सिपाही उनका सामान लेकर घर जाते हैं
और उनकी छुट्टी खतम होने पर उनका सामान वापस लेकर आते है।
इस दौरान युनिट के सभी फौजियों की छुट्टियां रद्द कर दी जाती हैं।
सिक्कम के लोग भगवान कंचनजुंगा के बाद दूसरा भगवान इन्हें मानते
हैं।

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

हिन्दू धर्म (संस्कृत: सनातन धर्म)

हिन्दू धर्म (संस्कृत: सनातन धर्म) विश्व के सभी धर्मों में सबसे पुराना धर्म है। ये वेदों पर आधारित धर्म है, जो अपने अन्दर कई अलग अलग उपासना पद्धतियाँ, मत, सम्प्रदाय, और दर्शन समेटे हुए है। अनुयायियों की संख्या के आधार पर ये विश्व का तीसरा सबसे बड़ा धर्म है, संख्या के आधार पर इसके अधिकतर उपासक भारत में हैं और प्रतिशत के आधार पर नेपाल में है। हालाँकि इसमें कई देवी-देवताओं की पूजा की जाती है, लेकिन वास्तव में यह एकेश्वरवादी धर्म है।

हिन्दी में इस धर्म को सनातन धर्म अथवा वैदिक धर्म भी कहते हैं। इण्डोनेशिया में इस धर्म का औपचारिक नाम "हिन्दु आगम" है। हिन्दू केवल एक धर्म या सम्प्रदाय ही नही है अपितु जीवन जीने की एक पद्धति है "


हिन्दू धर्म का १९६०८५३११० साल का इतिहास हैं। भारत (और आधुनिक पाकिस्तानी क्षेत्र) की सिन्धु घाटी सभ्यता में हिन्दू धर्म के कई चिह्न मिलते हैं। इनमें एक अज्ञात मातृदेवी की मूर्तियाँ, शिव पशुपति जैसे देवता की मुद्राएँ, लिंग, पीपल की पूजा, इत्यादि प्रमुख हैं। हिन्दू धर्म का मूल कदाचित सिन्धु सरस्वती परम्परा (जिसका स्रोत मेहरगढ़ की ६५०० ईपू संस्कृति में मिलता है) से भी पहले की भारतीय परम्परा में है।

भारतवर्ष को प्राचीन ऋषियों ने "हिन्दुस्थान" नाम दिया था जिसका अपभ्रंश "हिन्दुस्तान" है। "बृहस्पति आगम" के अनुसार:

हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्। तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते॥

अर्थात, हिमालय से प्रारम्भ होकर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक यह देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है।

"हिन्दू" शब्द "सिन्धु" से बना माना जाता है। संस्कृत में सिन्धु शब्द के दो मुख्य अर्थ हैं - पहला, सिन्धु नदी जो मानसरोवर के पास से निकल कर लद्दाख़ और पाकिस्तान से बहती हुई समुद्र मे मिलती है, दूसरा - कोई समुद्र या जलराशि। ऋग्वेद की नदीस्तुति के अनुसार वे सात नदियाँ थीं : सिन्धु, सरस्वती, वितस्ता (झेलम), शुतुद्रि (सतलुज), विपाशा (व्यास), परुषिणी (रावी) और अस्किनी (चेनाब)। एक अन्य विचार के अनुसार हिमालय के प्रथम अक्षर "हि" एवं इन्दु का अन्तिम अक्षर "न्दु", इन दोनों अक्षरों को मिलाकर शब्द बना "हिन्दु" और यह भूभाग हिन्दुस्थान कहलाया। हिन्दू शब्द उस समय धर्म की बजाय राष्ट्रीयता के रुप में प्रयुक्त होता था। चूँकि उस समय भारत में केवल वैदिक धर्म को ही मानने वाले लोग थे, बल्कि तब तक अन्य किसी धर्म का उदय नहीं हुआ था इसलिये "हिन्दू" शब्द सभी भारतीयों के लिये प्रयुक्त होता था। भारत में केवल वैदिक धर्मावलम्बियों (हिन्दुओं) के बसने के कारण कालान्तर में विदेशियों ने इस शब्द को धर्म के सन्दर्भ में प्रयोग करना शुरु कर दिया।

आम तौर पर हिन्दू शब्द को अनेक विश्लेषकों द्वारा विदेशियों द्वारा दिया गया शब्द माना जाता है। इस धारणा के अनुसार हिन्दू एक फ़ारसी शब्द है। हिन्दू धर्म को सनातन धर्म या वैदिक धर्म भी कहा जाता है। ऋग्वेद में सप्त सिन्धु का उल्लेख मिलता है - वो भूमि जहाँ आर्य सबसे पहले बसे थे। भाषाविदों के अनुसार हिन्द आर्य भाषाओं की "स्" ध्वनि (संस्कृत का व्यंजन "स्") ईरानी भाषाओं की "ह्" ध्वनि में बदल जाती है। इसलिये सप्त सिन्धु अवेस्तन भाषा (पारसियों की धर्मभाषा) मे जाकर हफ्त हिन्दु मे परिवर्तित हो गया (अवेस्ता: वेन्दीदाद, फ़र्गर्द 1.18)। इसके बाद ईरानियों ने सिन्धु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिन्दु नाम दिया। जब अरब से मुस्लिम हमलावर भारत में आए, तो उन्होने भारत के मूल धर्मावलम्बियों को हिन्दू कहना शुरू कर दिया।

हिन्दू धर्म में कोई एक अकेले सिद्धान्तों का समूह नहीं है जिसे सभी हिन्दुओं को मानना ज़रूरी है। ये तो धर्म से ज़्यादा एक जीवन का मार्ग है। इसके अन्तर्गत कई मत और सम्प्रदाय आते हैं, और सभी को बराबर श्रद्धा दी जाती है। धर्मग्रन्थ भी कई हैं। फ़िर भी, वो मुख्य सिद्धान्त, जो ज़्यादातर हिन्दू मानते हैं, हैं इन सब में विश्वास : धर्म (वैश्विक क़ानून), कर्म (और उसके फल), पुनर्जन्म का सांसारिक चक्र, मोक्ष (सांसारिक बन्धनों से मुक्ति--जिसके कई रास्ते हो सकते हैं), और बेशक, ईश्वर। हिन्दू धर्म स्वर्ग और नरक को अस्थायी मानता है। हिन्दू धर्म के अनुसार संसार के सभी प्राणियों में आत्मा होती है। मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो इस लोक में पाप और पुण्य, दोनो कर्म भोग सकता है, और मोक्ष प्राप्त कर सकता है। हिन्दू धर्म में चार मुख्य सम्प्रदाय हैं : वैष्णव (जो विष्णु को परमेश्वर मानते हैं), शैव (जो शिव को परमेश्वर मानते हैं), शाक्त (जो देवी को परमशक्ति मानते हैं) और स्मार्त (जो परमेश्वर के विभिन्न रूपों को एक ही समान मानते हैं)। लेकिन ज्यादातर हिन्दू स्वयं को किसी भी सम्प्रदाय में वर्गीकृत नहीं करते हैं।

संक्षेप में, हिन्‍दुत्‍व के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं-

हिन्दू-धर्म हिन्दू-कौन?--
गोषु भक्तिर्भवेद्यस्य प्रणवे च दृढ़ा मतिः।
पुनर्जन्मनि विश्वासः स वै हिन्दुरिति स्मृतः।।
अर्थात-- गोमाता में जिसकी भक्ति हो, प्रणव जिसका पूज्य मन्त्र हो, पुनर्जन्म में जिसका विश्वास हो--वही हिन्दू है।

मेरुतन्त्र ३३ प्रकरण के अनुसार
' हीनं दूषयति स हिन्दु ' अर्थात जो हीन ( हीनता या नीचता ) को दूषित समझता है (उसका त्याग करता है) वह हिन्दु है।

लोकमान्य तिलक के अनुसार-
असिन्धोः सिन्धुपर्यन्ता यस्य भारतभूमिका।
पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिन्दुरिति स्मृतः।।
अर्थात्- सिन्धु नदी के उद्गम-स्थान से लेकर सिन्धु (हिन्द महासागर) तक सम्पूर्ण भारत भूमि जिसकी पितृभू (अथवा मातृ भूमि) तथा पुण्यभू ( पवित्र भूमि) है, ( और उसका धर्म हिन्दुत्व है ) वह हिन्दु कहलाता है।

कालिका पुराण, मेदनी कोष आदि के आधार पर वर्तमान हिन्दू ला के मूलभूत आधारों के अनुसार वेदप्रतिपादित रीति से वैदिक धर्म में विश्वास रखने वाला हिन्दू है। यद्यपि कुछ लोग कई संस्कृति के मिश्रित रूप को ही भारतीय संस्कृति मानते है, जबकि ऐसा नही है। जिस संस्कृति या धर्म की उत्पत्ती एवं विकास भारत भूमि पर नहीं हुआ है, वह धर्म या संस्कृति भारतीय ( हिन्दू ) कैसे हो सकती है।


1. ईश्वर एक नाम अनेक

2. ब्रह्म या परम तत्त्व सर्वव्यापी है

3. ईश्वर से डरें नहीं, प्रेम करें और प्रेरणा लें

4. हिन्दुत्व का लक्ष्य स्वर्ग-नरक से ऊपर

5. हिन्दुओं में कोई एक पैगम्बर नहीं है,

6. धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर बार-बार पैदा होते हैं

7. परोपकार पुण्य है दूसरों के कष्ट देना पाप है.

8. जीवमात्र की सेवा ही परमात्मा की सेवा है

9. स्त्री आदरणीय है

10. सती का अर्थ पति के प्रति सत्यनिष्ठा है

11. हिन्दुत्व का वास हिन्दू के मन, संस्कार और परम्पराओं में

12. पर्यावरण की रक्षा को उच्च प्राथमिकता

13. हिन्दू दृष्टि समतावादी एवं समन्वयवादी

14. आत्मा अजर-अमर है

15. सबसे बड़ा मंत्र गायत्री मंत्र

16. हिन्दुओं के पर्व और त्योहार खुशियों से जुड़े हैं

17. हिन्दुत्व का लक्ष्य पुरुषार्थ है और मध्य मार्ग को सर्वोत्तम माना गया है

18. हिन्दुत्व एकत्व का दर्शन है


हिन्दू धर्मग्रन्थ उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म ही परम तत्व है (इसे त्रिमूर्ति के देवता ब्रह्मा से भ्रमित न करें)। वो ही जगत का सार है, जगत की आत्मा है। वो विश्व का आधार है। उसी से विश्व की उत्पत्ति होती है और विश्व नष्ट होने पर उसी में विलीन हो जाता है। ब्रह्म एक, और सिर्फ़ एक ही है। वो विश्वातीत भी है और विश्व के परे भी। वही परम सत्य, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है। वो कालातीत, नित्य और शाश्वत है। वही परम ज्ञान है। ब्रह्म के दो रूप हैं : परब्रह्म और अपरब्रह्म। परब्रह्म असीम, अनन्त और रूप-शरीर विहीन है। वो सभी गुणों से भी परे है, पर उसमें अनन्त सत्य, अनत चित् और अनन्त आनन्द है। ब्रह्म की पूजा नही की जाती है, क्योंकि वो पूजा से परे और अनिर्वचनीय है। उसका ध्यान किया जाता है। प्रणव ॐ (ओम्) ब्रह्मवाक्य है, जिसे सभी हिन्दू परम पवित्र शब्द मानते हैं। हिन्दु यह मानप्ते है कि ओम की ध्वनि पूरे ब्रह्मान्द मे गून्ज रही है। ध्यान मे गहरे उतरने पर यह सुनाई देता है। ब्रह्म की परिकल्पना वेदान्त दर्शन का केन्द्रीय स्तम्भ है, और हिन्दू धर्म की विश्व को अनुपम देन है।(यह ऐक प्रतिलिपि  है ) - रामदेवसिह बालेसर

सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

गलतियौ से जुदा तु भी नही मे भी नही।

गलतियौ से जुदा तु भी नही मे भी नही।. दोनो ईनसान हे खुदा तु भी नही मे भी नही।. तु मुझे और मैं तुझे  लम्हा देते हे मगर।.अपने अंऩदर झाकता तु भी नही मे भी नही। मसलेहतौ ने कर दिया दोनो मे पैदा ईकथलाप।वरना फितरत का बुरा तु भी नही मे भी नही।मुखतलिप सिमटो मे दोनो का सफर जारी रहा। ईक लम्है के लिये रुका तु भी नही मे भी नही। चाहते दोनो बहुत एक दुसरे को हे। मगर ये हकीकत हे कि मानता तु भी नही मे भी नही॥-रामदेवसिह (बालेसर)
गलतियौ से जुदा तु भी नही मे भी नही।. दोनो ईनसान हे खुदा तु भी नही मे भी नही।. तु मुझे और मैं तुझे  लम्हा देते हे मगर।.अपने अंऩदर झाकता तु भी नही मे भी नही। मसलेहतौ ने कर दिया दोनो मे पैदा ईकथलाप।वरना फितरत का बुरा तु भी नही मे भी नही।मुखतलिप सिमटो मे दोनो का सफर जारी रहा। ईक लम्है के लिये रुका तु भी नही मे भी नही। चाहते दोनो बहुत एक दुसरे को हे। मगर ये हकीकत हे कि मानता तु भी नही मे भी नही॥-रामदेवसिह (बालेसर)