सोमवार, 23 जुलाई 2012

कुलधरा, खाभा,जैसलमेर

कुलधरा, खाभा,जैसलमेर:- पालीवाल ब्राह्मणों के प्राचीन वैभव का प्रतीक- कुलधरा और खाभा गाँवों के खंडहर!
जैसलमेर जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा वर्षों पूर्व परित्यक्त कुलधरा एवं खाभा नामक दो गाँवों के प्राचीन खंडहर स्थित है जो पालीवालों की संस्कृति, उनकी जीवनशैली, वास्तुकला एवं भवन निर्माण कला को अभिव्यक्त करते हुए अद्भुत अवशेष हैं। प्राचीन काल में बसे पालीवालों... की सामूहिक सुरक्षा, परस्पर एकता व सामुदायिक जीवन पद्धति को दर्शाने वाले कुलधरा व खाभा गाँवों को पालीवाल ब्राह्मणों ने जैसलमेर रियासत के दीवान सालिम सिंह की ज्यादतियों से बचने तथा अपने आत्म सम्मान की रक्षा के लिए एक ही रात में खाली करके उजाड़ कर दिए। पश्चिमी राजस्थान के पालीवालों की सांस्कृतिक धरोहर के प्रतीक इन खंडहरों के संरक्षण के लिए सरकार द्वारा प्रयास किए गए हैं। कुलधरा में पालीवालों द्वारा निर्मित कतारबद्ध मकानों, गांव के मध्य स्थित कलात्मक मंदिर, कलात्मक भवन एवं कलात्मक छतरियां पालीवाल-वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। जैसलमेर विकास समिति द्वारा पुराने क्षतिग्रस्त भवनों का रखरखाव किया जा रहा है। इनमें पालीवालों की समृद्ध संस्कृति, वास्तुकला, गाँव के इतिहास तथा रेगिस्तान में उत्कृष्ट जल संरक्षण व्यवस्था को देख कर पर्यटक काफी प्रभावित होते हैं। कुलधरा में पर्यटकों के लिए एक कैक्टस पार्क भी स्थापित किया है। जैसलमेर के विश्वविख्यात मरु महोत्सव के दौरान देशी-विदेशी सैलानियों को पालीवालों द्वारा परित्यक्त वैभवशाली रहे गांव कुलधरा को दिखाने के लिए यहाँ एक दिन का कार्यक्रम रखा जाता हैं जिससे वे इन ब्राह्मणों के प्राचीन ग्राम्य स्थापत्य और लोक जीवन के कल्पना लोक में आनंद ले सके तथा किसी जमाने में सर्वाधिक समृद्ध एवं उन्नत सभ्यता के धनी रहे कुलधरा गांव में पालीवालों का लोक जीवन, बसावट, शिल्प-स्थापत्य और वास्तुशास्त्रीय नगर नियोजन जैसी कई विलक्षणताओं की झलक पाकर पुराने युग के परिदृश्यों में साकार रूप में पा सकें। ये सैलानी कुलधरा गांव में खण्डहरों में विचरण करते हुए मन्दिर, मकानों के खण्डहर, गृह सज्जा व गृहप्रबन्धन, जल प्रबन्धन, ग्राम्य विकास आदि सभी पहलुओं को देखते हैं तथा प्राचीन ग्राम्य प्रबन्धन की सराहना करते हैं। इसके अलावा काफी संख्या में सैलानी कुलधरा के समीप खाभा में भी खाभा के किले और पुरातन अवशेषों का अवलोकन करने भी जाते हैं। कुलधरा पालीवालों का गांव था और पता नहीं ऐसा क्या हुआ कि एक दिन अचानक यहां फल-फूल रहे पालीवाल अपनी इस सरज़मीं को छोड़कर अन्यत्र चले गये। उसके बाद से आज तक कुलधरा, खाभा, नभिया, धनाव सहित 84 गांवों पर कोई बस नहीं सका। कोशिशें भी हुईं पर सभी नाकाम हो गयीं । कुलधरा के अवशेष आज भी विशेषज्ञों और पुरातत्वविदों के अध्ययन का केंद्रबिंदु बनी हुई है। कई मायनों में पालीवालों ने कुलधरा गाँव को वैज्ञानिक आधार पर विकसित किया था।
कुलधरा जैसलमेर से तकरीबन अठारह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। पालीवाल समुदाय के इस इलाक़े में चौरासी गांव थे और कुलधरा उनमें से एक था। ब्राह्मणों की कुलधार शाखा ने सन् 1291 में तकरीबन छह सौ घरों वाले इस गाँव को बसाया था। पालीवालों का नाम दरअसल इसलिए पड़ा क्योंकि वे राजस्थान के पाली इलाक़े के रहने वाले थे। ब्राह्मण होते हुए भी वह बहुत ही उद्यमी समुदाय था। अपनी बुद्धिमत्ता, कौशल और अटूट परिश्रम से उन्होंने धरती पर सोना उगाया।
             हैरत की बात ये है कि पाली से कुलधरा आने के बाद पालीवालों ने रेगिस्तानी सरज़मीं के बीचो-बीच इस गांव को बसाते हुए खेती-केंद्रित-समाज की परिकल्पना की। यानी रेगिस्ता़न में खेतिहर समाज की कल्पना। पालीवालों की समृद्धि का एक रहस्य जिप्सम की परतवाली ज़मीन को पहचानकर वहां बस जाना था। अपनी वैज्ञानिक प्रयोग और आधुनिक सोच की वजह से ही पालीवाल उस समय में भी इतनी तरक्की कर पाए थे। यह समुदाय आमतौर पर खेती और मवेशी पालने पर निर्भर रहता और बड़ी शान से जीवनयापन करता। और इसी से उन्होंने समृद्धि अर्जित की।
दिलचस्प बात ये है कि रेगिस्तान में उन्होंने सतह पर बहने वाली या ज़मीन पर मौजूद पानी का सहारा नहीं लिया बल्कि उन्होंने रेत में मौजूद पानी का इस्तेमाल किया। वे ऐसी जगह पर गांव बसाते थे जहां धरती के भीतर जिप्सम की परत हो। जिप्सम की परत बारिश के पानी को ज़मीन में अवशोषित होने से रोकती है और इसी पानी से वे खेती किया करते थे। और वह भी ऐसी वैसी नहीं बल्कि जबर्दस्त फसल पैदा करते। उनके जल-प्रबंधन की इसी तकनीक ने थार के रेगिस्तान को इंसानों और मवेशियों की आबादी या तादाद के हिसाब से दुनिया का सबसे सघन रेगिस्तान बनाया। अपने अनुभवों के आधार पर उन्होंने ऐसी तकनीक विकसित कर ली थी जिससे कि बारिश का पानी रेत में गुम न होकर एक खास गहराई पर जमा हो जाता था।
                         कुलधरा की वास्तुकला के बारे में कुछ दिलचस्प तथ्य यह है कि कुलधरा गाँव में दरवाज़ों पर ताला नहीं लगता था। गांव के मुख्य प्रवेश-द्वार और गांव के घरों के बीच बहुत लंबा फ़ासला था लेकिन ध्वनि-प्रणाली ऐसी थी कि मुख्य-द्वार से ही क़दमों की आवाज़ गांव तक पहुंच जाती थी। दूसरी बात उन्होंने ये बताई कि गांव के तमाम घर झरोखों के ज़रिए आपस में जुड़े हुए थे। इसलिए एक सिरे वाले घर से दूसरे सिरे वाले घर तक अपनी बात आसानी से पहुंचाई जा सकती थी। घरों के भीतर पानी के कुंड, ताक और सीढि़यां कमाल के हैं। कहते हैं कि वहाँ के घर इस कोण में गये थे कि हवाएं सीधे घर के भीतर होकर गुज़रती थीं। कुलधरा के ये घर रेगिस्तान में भी वातानुकूलन का अहसास देते थे ।
                   ऐसे उन्नत और विकसित 84 गांव एक दिन अचानक खाली कैसे हो गए! यह आज भी एक अनसुलझा रहस्य ही है।
कहते हैं कि जैसलमेर के तत्कालीन राजा सालम सिंह को कुलधरा की समृद्धि बर्दाश्त नहीं हो रही थी। उसने कुलधरा के बाशिंदों पर भारी कर (टैस्स) लगा दिए थे। पालीवालों का तर्क था कि चूंकि वो ब्राह्मण हैं इसलिए वो ये कर नहीं देंगे लेकिन राजा ने उनके इस तर्क को ठुकरा दिया। ये बात स्वाभिमानी पालीवालों को हज़म नहीं हुई और समुदाय के मुखियाओं के विचार-विमर्श के बाद उन्होंने इस सरज़मीं से हमेशा-हमेशा के लिए जाने का फैसला कर लिया।
                       इस संबंध में एक कथा और भी है। कहते हैं कि जैसलमेर के दिलफेंक दीवान को कुलधरा की एक लड़की पसंद आ गयी थी। ये बात पालीवालों को बर्दाश्त नहीं हुई और वे रातों रात यहां से हमेशा-हमेशा के लिए चले गए। अब सच क्या है, ये जानना वाकई में बेहद ही मुश्किल है लेकिन कुलधरा के इस वीरान खंडहरों में घूमकर मुझे अजीब-सा लगा। इन घरों, चबूतरों, अटारियों को देखकर पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा था कि अभी कोई महिला सिर पर गगरी रखे निकल पड़ेगी या कोई बूढ़ा-बुजुर्ग चबूतरे पर हुक्का गुड़गुड़ाता दिखेगा। बच्चे धूल-मिट्टी में लिपटे खेलते नज़र आएंगे और पगड़ी लगाए पालीवाल अपने खेतों पर निकल रहे होंगे। पर सच यह है कि सदियों से पालीवालों का ये गांव पूरी तरह से वीरान है अफ़सोस यह है कि पालीवालों के वैज्ञानिक रहस्य कुलधरा के अवशेषों के साथ ही गुम हो जाएंगे- रामदेवसिह बालेसर

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