~~ नेहरु का भारत रत्न~~ (शेयर करे) भारत रत्न से जुड़ी सियासत पहले तीन भारत रत्न के बाद से डगमगाने लगी। 1954 में देश के सबसे विशिष्ट नागरिक अलंकरण यानी भारत रत्न से उपराष्ट्रपति सर्वेपल्ली राधाकृष्णन, पूर्व गवर्नर जनरल राजगोपालाचारी और नोबेल पुरस्कार से सम्मानित वैज्ञानिक चंद्रशेखर वेंकटरमन को सम्मानित किया गया। लेकिन... अगले ही बरस यानी 1955 में भारत रत्न के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय से जो चौथा नाम निकला वह खुद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का था। यानी खुद से खुद को सबसे बड़े नागरिक अलंकरण से सम्मानित करने की यह पहली पहल थी। इसके बाद इसका दोहराव सोलह बरस बाद 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया। एक बार फिर पीएमओ से जो नाम भारत रत्न के लिए निकला वह खुद प्रधानमंत्री का था।दरअसल, सत्ता का असर कैसे भारत रत्न जैसे फैसलों में जाहिर होता है, यह 1991 में भी दिखा। तब के प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को यह अलंकरण मरणोपरांत दिए जाने की घोषणा की। चंद्रशेखर की सरकार कांग्रेस के समर्थन से बनी थी और इस फैसले से जाहिर है वे कांग्रेस को खुश करना चाहते नेहरु को भारत रत्न क्यों-1- जिसने कश्मीर को समस्या बना दिया |नेहरू को कश्मीर समस्या का जनक बताया गया है। कश्मीर में जब पाकिस्तानी सेना सर पर पैर रखकर भाग रही थी, उसी समय माउन्टबेटन ने युद्ध विराम करा दिया और 32000 वर्ग मील जमीन पाकिस्तान के कब्जे में चली गई। इसे नेहरू की अदूरदर्शिता ही कहा जाएगा। 2-जिनके लेडी माउंटबेटन (अन्तिम वायसराय लार्ड माउन्टबेटेन की पत्नी एडविना) के साथ नजदीकी सम्बन्ध थे | एडविना की बेटी पामेला हिल्स ने भी इसे स्वीकार किया कि दोनों के बीच भावनात्मक सम्बन्धों को नजदीक से देखा था। एडविना की मृत्यु के बाद उनके सूटकेस से मिले नेहरू के अनेको प्रेम–पत्रों ने इसकी पुष्टि की | इसी आधार पर पामेला ने ‘‘इण्डिया रिमेम्बर्ड : ए पर्सनल एकाउन्ट आफ द माउन्टबेटन ड्यूरिंग द ट्रांसफर आफ पावर’ नामक पुस्तक लिखी। 3-जिन्हें भारत का विभाजन का जबाबदेह माना जाता है | 4-जिन्हें चीन द्वारा भारत पर हमला का जबाबदेह माना जाता है | तिब्बत को चीन की झोली में डालने वाले तथा दलाईलामा को भारत में शरण देकर चीन को भारत का शत्रु बनाने वाले नेहरू ही थे। ‘हिन्दी–चीनी भाई–भाई’ का नारा लगता रहा और चीन ने आक्रमण कर दिया। शत्रु–मित्र की पहचान का प्राय: अभाव था नेहरु में | 5-जिन्हें मुस्लिम तुष्टीकरण का जबाबदेह माना जाता है | 6- जिन्हें भारतीय राजनीति में वंशवाद को बढावा देने का जबाबदेह माना जाता है |भारत में वंशवाद खूब चलता है। मोतीलाल नेहरु- जवाहरलाल नेहरु – इंदिरा गाँधी – राजीव गाँधी, सोनिया गाँधी – राहुल गाँधी इसके स्पष्ट प्रमाण हैं | 7-जिन्हें हिन्दी को भारत की राजभाषा बनने में देरी करना व अन्त में अनन्त काल के लिये स्थगन का जबाबदेह माना जाता है | 8-.जिन्हें ग्रामीण भारत की अनदेखी का जबाबदेह माना जाता है | 9- जिन्हें स्वतंत्र भारत को पाश्चात्य सभ्यता–संस्कृति का दास बनाने का जबाबदेह माना गया है | 10- जिनके बारे में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के चुनाव के पच्चीस वर्ष बाद चक्रवर्ती राज-गोपालचारी ने लिखा-‘‘निस्संदेह बेहतर होता, यदि नेहरू को विदेश मंत्री तथा सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाया जाता” । यदि बहुमत का आदर किया गया होता तो सरदार पटेल भारत के प्रधानमंत्री होते, परन्तु गांधी, पटेल से घबराते थे। माउन्टबेटेन भी पटेल से चिढ़ते थे। 11- जिन्हें लार्ड माउन्टबेटन के प्रति नैसर्गिक श्रद्धा का जबाबदेह माना गया है |सरदार पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, राजगोपालाचारी, नरेन्द्रदेव, जयप्रकाश, लोहिया आदि से नेहरू की कभी नहीं पटी। 12- जिन्हें सुभाषचन्द्र बोस का ठीक से पता नहीं लगाने का जबाबदेह माना जाता है | 13- जिसे खूबसूरत औरतें बहुत पसन्द थी। नेहरू की पद्मजा नायडू, लेडी माउंटबेटेन से खूब पटती थी। श्रीमती बच्चन की चाय उन्हें बहुत पसन्द थी, नर्गिस–सुरैया के वे प्रशंसक थे, वैजयन्ती माला को वे सेब अपने हाथों से खिलाते थे। 14 - जिन्हें भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिये चीन के समर्थन का जबाबदेह माना जाता है | 15-जिन्हें वरिष्ठ पत्रकार डॉ. रामप्रसाद मिश्र ने स्वतंत्र भारत का शोक कहा है। ~~जय महाकाल ~~
सोमवार, 16 अप्रैल 2012
गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012
ghaltiyo se juda tu bhi nahi main bhi nahi .dono insaan hai khuda tu bhi nahi mai bhi nhi.tu mujhe or mai tujhe ilzaam dety hain mager .apne andar jhankta tu bhi nani mai bhi nhi. maslehat ne kardia .dono mai paida ikhtilaaf .warna fitrt ka .bura tu bhi nahi mai bhi nhi .mukhalif simto main dono ko safer jaari raha .ek lamhe ko ruka tu bhi nahi mai bhi nhi.chate dono bohat ek doosre ko hain magar ye haqiqat hai k maanta tu bhi nahi mai bhi nhi -RD Singh Inda
मंगलवार, 10 जनवरी 2012
गुरुवार, 29 दिसंबर 2011
वो कौम न मिटने पायेगी
वो कौम न मिटने पायेगी
ठोकर लगने पर हर बार , उठती जाएगी |
युग युग से लगे है यहाँ पर देवों के दरबार
इस आँगन में राम थे खेले , खेले कृष्ण कुमार , झूम उठे अवतार ||
...
गंगा को धरती पर लाने भागीरथ थे आये
ध्रुव की निष्ठा देख के भगवन पैदल दौड़े आये , साधक आते जायें ||
विपदा में जो देवों की थी अभयदायिनी त्राता ही
चंडी जिनकी कुलदेवी हो बल तो उसमे आता ही , जय दुर्गा माता की ||
बैरी से बदला लेने जो हंस हंस शीश चढाते
शीश कटे धड से अलबेले बढ़-बढ़ दांव लगाते , मरकर जीते जाते |
जिनके कुल की कुल ललनाएं कुल का मान बढाती
अपने कुल की लाज बचाने लपटों में जल जाती , यश अपयश समझाती ||
मरण को मंगलमय अवसर गिन विधि को हाथ दिखाने
कर केसरिया पिए कसूँबा जाते धूम मचाने , मौत को पाठ पढ़ाने ||
कितने मंदिर कितने तीरथ देते यही गवाही
गठजोड़ों को काट चले थे बजती रही शहनाई , सतियाँ स्वर्ग सिधाई ||
कष्टों में जिस कौम के बन्दे जंगल -जंगल छानेंगे
भोग एश्वर्य आदि की मनुहारें ना मानेंगे , घर-घर दीप जलाएंगे ||
ठोकर लगने पर हर बार , उठती जाएगी |
युग युग से लगे है यहाँ पर देवों के दरबार
इस आँगन में राम थे खेले , खेले कृष्ण कुमार , झूम उठे अवतार ||
...
गंगा को धरती पर लाने भागीरथ थे आये
ध्रुव की निष्ठा देख के भगवन पैदल दौड़े आये , साधक आते जायें ||
विपदा में जो देवों की थी अभयदायिनी त्राता ही
चंडी जिनकी कुलदेवी हो बल तो उसमे आता ही , जय दुर्गा माता की ||
बैरी से बदला लेने जो हंस हंस शीश चढाते
शीश कटे धड से अलबेले बढ़-बढ़ दांव लगाते , मरकर जीते जाते |
जिनके कुल की कुल ललनाएं कुल का मान बढाती
अपने कुल की लाज बचाने लपटों में जल जाती , यश अपयश समझाती ||
मरण को मंगलमय अवसर गिन विधि को हाथ दिखाने
कर केसरिया पिए कसूँबा जाते धूम मचाने , मौत को पाठ पढ़ाने ||
कितने मंदिर कितने तीरथ देते यही गवाही
गठजोड़ों को काट चले थे बजती रही शहनाई , सतियाँ स्वर्ग सिधाई ||
कष्टों में जिस कौम के बन्दे जंगल -जंगल छानेंगे
भोग एश्वर्य आदि की मनुहारें ना मानेंगे , घर-घर दीप जलाएंगे ||
शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011
दोस्तों, कृपया 1 मिनट का समय देकर इसे पढ़ें
दोस्तों, कृपया 1 मिनट का समय देकर इसे पढ़ें. अगर आपको लगता है कि बात में सच्चाई है तो यह सन्देश दूसरों को भी फॉरवर्ड करें .
अन्ना, स्वामी रामदेव या अन्य जो भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड रहे है उनसे कांग्रेस क्यों परेशान है, जानिए कारण:
1- सरकार हर साल लोगों से 134 प्रकार के टैक्स से कितना पैसा जमा कराती है और ये पैसे कहा खर्च हो जाते है?
...
2-मंदिरों का पैसा सरकार किस मद में खर्च कराती है जिसे सिर्फ हिन्दू दान देकर इकठ्ठा करता है, ये बहुत बड़ा प्रश्न है.
3- काले धन का इतिहास क्या है, पहले कपिल सिब्बल ने कहा कोई भी नुकसान २ जी घोटाले में नहीं हुआ है, फिर अहलुवालिया ने कहा की हा वास्तव में कोई घोटाला नहीं हुआ है, फिर मनमोहन ने कहा इसकी जाँच चल रही है, विपक्ष को टालते रहे, राजा जैसा आदमी जिसके पास अपनी मोबाइल को टाप अप करने का पैसा नहीं हो, यदि वह अपनी पत्नी के नाम 3000 करोड़ रुपया मारीशाश में जमा कर दे, क्या यह सब बिना सोनिया की जानकारी के कर सकता है, उस पार्टी में जहा पर बिना सोनिया के पूछे कोई वक्तव्य तथाकथित प्रवक्ता नहीं दे सकते है,
4- फिर आया महा घोटाला देवास-इसरो डील का जिसमे की 205000 करोड़ की बैंड विड्थ को मात्र 1200 करोड़ के 10 साल के उधार के पैसे में दे दिया गया, भला हो सुब्रमनियम स्वामी जी का जिन्हें इन चोरो को नंगा कर दिया, हमारी कांग्रेसी और विदेशी मिडिया सुब्रमनियम स्वामी की तस्वीर हमेशा से गलत पेश किया है जब की वास्तव में भारत देश को ऐसे ही इमानदार नेताओ की जरुरत है जिसने कभी भी चोरी के बारे में सोचा ही नहीं,
5- फिर आया कामनवेल्थ खेल का 90000 करोड़ का घोटाला, फिर कोयला का घोटाला जिसमे ठेकेदारों द्वारा 10 पैसे प्रति किलो के भाव से कोयला खरीदा जाता है और उसे बाजार में 4 रुपये किलो तक बेचा जाता है, यह रकम अब तक 26 लाख करोड़ होती है,
6- इटली के 8 बैंक और स्वीटजरलैंड के 4 बैंको को 2005 में भारत में क्यों खोला गया है और इसमे किसका पैसा जमा होता है, ये बैंक किसको लोन देते है और इनका ब्याज क्या है, इनकी जरुरत क्यों आ पड़ी भारत में जब की भारत के ही बैंकरों की बैंक खोलने की अर्जियाँ सरकार के पास धूल खा रही है, इन बैंको को चोरी छुपे क्यों खोला गया है, इन बैंको आवश्यकता क्यों है जब भारत में 80% लोग 20 रूपया प्रतिदिन से भी कम कमाते है.
7-भारत के किसानो से कमीशन लेने वाले चोर कत्रोची के बेटे को अंदमान दीप समूह में तेल की खुदाई का ठेका क्यों दिया गया 2005 में, किसने दिया ठेका, किसके कहने पर दिया ठेका, क्या वहा पर पहले से ही तेल के कुऊ का पता लगाकर वह स्थान इसे दे दिया गया जैसे की बहुत बार खबरों में अन्य संदर्भो में आती है, यह खबर क्यों छुपाई गयी अब तक, इसे देश को क्यों नहीं बताया गया, मिडिया क्यों इसे छुपा गई, और विपक्ष ने इसे मुद्दा क्यों नहीं बनाया.
8- सरकार ने पहले कहा की बाबा बकवास कर रहे है, काला धन नाम की कोई चीज नहीं है, फिर खबर आयी की काला धन है और सबसे ज्यादा भारतीयों का है, यह स्विस बैंको के आलावा 70 और दुसरे देसों में जमा है,
9- सरकार ने कहा की टैक्स चोरी का मामला है, हम उन देशो से समझौते कर रहे है, जिससे की दोहरा कर न देना पड़े, यह टैक्स चोरी नहीं भारत देशको लूट डालने का मामला है
10- फिर बात आई की यदि ये भ्रष्टाचारी और लुटेरे इसमे से 15% टैक्स सरकार को दे तो इसे भारत के बैंको में जमा करने दिया जायेगा और किसी को यह हक़ नहीं होगा की वह पूछे की या इतना पैसा कैसे कमाया या लूटा. सरकार इस पर एक कानून क्यो नही ला रही है, किसको बचाया जा रहा है?
11- यूरिया घोटाला है और यूरिया किसान को दुगुने दाम बेचा जाता है, फिर गेहू सस्ते में खरीदा जाता है, हम अभी तक सुरक्षित अन्न भण्डारण की व्यवस्था क्यों नहीं बना पाए जब की हमारे पास धन की कमी ही नहीं है, क्योकि अन्न को सडा दिखाकर उसे कौड़ियो के भाव शराब माफिया को बचा जाता है जब की गरीब अन्न बिना मर रहा है।
12-हमारे देश में क्यों अनुसन्धान के लिए पर्याप्त पैसा नहीं दिया जाता है, यह कीसकी चाल है, जिसकी वजह से हम 5-10 गुना दाम में विदेशी चीजे खरीदते है, क्या कारण है की हमारे देश में एक भी सोलर ऊर्जा वैज्ञानिक नहीं है और दुनिया भर के परमाणु वैज्ञानिक है जो हमें हमेशा झूठा अश्वाव्हन देते है की यह परमाणु बिजली सस्ती और निरापद है भारत की परमाणु से सम्बंधित कुल बाजार 750 लाख करोड़ का होगा. जब की हम भारत में 400000 मेगावाट सोलर बिजली बना सकते है,
13-ऐसे कौन से कारण है जिनके कारन हम नेहरू के द्वारा ट्रांसफर अफ पॉवर अग्रीमेंट 14 अगस्त 1947 को दस्तखत करने के बाद भी आज तक विक्सित नहीं बन पाए, जब की हमारी जनता हफ्ते में 90 घंटा काम करती है जबकि कामचोर अंग्रेज हफ्ते में सिर्फ 30 घंटा काम करते है,
14-क्या कारण है की हमारे 5೦ रुपये में 1 डालर और 90 रुपये में 1 पौंड मिलाता है, जब की 1947 में 1 रुपये में 1 डालर मिलता था.
15- मीडिया को निष्पक्ष बनाने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है, मिडिया , टीवी और पत्रिकाए सरकार को बिक जाती है और निराधार और झूठ को भी सच बताकर प्रस्तुत करती है।
16- अगर देश में 2 लाख करोड़ रुपये की नकदी सर्कुलेशन में है तो देश की अर्थव्यवस्था करीब 100 लाख करोड़ रुपयों की होती है. और हमारे देश में रिजर्व बैंक अबतक लगभग 18 लाख करोड़ रुपयों के नोट छाप चुका है और कमसे कम 10 लाख करोड़ रुपये सर्कुलेशन में है. इस हिसाब से देश की अर्थव्यवस्था करीब 400 से 500 लाख करोड़ रुपये होनी चाहिए लेकिन अभी हमारी अर्थव्यवस्था केवल 60 लाख करोड़ की है. जबकि इतनी अर्थव्यवस्था के लिए दो लाख करोड़ से भी कम सर्कुलेशन मनी की जरूरत है.
17- अगर 400 लाख करोड़ रूपये का काला धन देश में वापिस आ जाता है तो देश की अर्थव्यवस्था करीब 20,000 लाख करोड़ रुपये होगी ... क्या आप जानते हैं कि इस समय अमेरिका सबसे शक्तिशाली देश है और उसकी अर्थव्यवस्था करीब 650 लाख करोड़ की है... मतलब 400 लाख करोड़ रुपये वापिस मिलने पर हम अमरीका से भी 30 गुना ज्यादा शक्तिशाली बन सकते है
शनिवार, 17 दिसंबर 2011
माता अब तो साँझ पड़ी है, रुस्यो दिन कद आसी ?
धरती रा थाम्भा कद धसकै, उल्ट्यो आभो कद आसी ?
माता अब तो साँझ पड़ी है, रुस्यो दिन कद आसी ?
हात्यां रा होदा कद टूटे, घोड़ा न कद धमकास्यूं ।
मुछ्याँ म्हारी कद बट खावै, खांडा ने कद खड़कास्यूं ।
... ... सुना पड़ग्या भुज म्हारा ए, अरियाँ नै कद जरकासी ।।
माता अब तो साँझ पड़ी है, रुस्यो दिन कद आसी ?
म्हारे जितां धरती लेग्या, चाकर आज धणी बणग्या,
दोखीडाँ रै दुःख सूं म्हारै, अन्तै में छाला पड़ग्या ।
आंसू झरती आँखड़ल्यां में, राता डोरा कद आसी ।।
माता अब तो साँझ पड़ी है, रुस्यो दिन कद आसी ?
गाठी म्हारी जीभ सुमरता, कान हुआ बोला थारै,
दिन पलट्यो जद मायड़ पल्टी, बेटा नै कुण बुचकारै ।
माँ थारो तिरशूल चलै कद, राकसडा कद आरडासी ।।
माता अब तो साँझ पड़ी है, रुस्यो दिन कद आसी ?
थारै तो लाखां बेटा है, म्हारी मायड़ इक रहसी,
हूँ कपूत जायो हूँ थारै, थनै कुमाता कुण कहसी ।
अब तो थारी पत जावै है, बाघ चढ़यां तू कद आसी ।।
माता अब तो साँझ पड़ी है, रुस्यो दिन कद आसी ?
माता अब तो साँझ पड़ी है, रुस्यो दिन कद आसी ?
हात्यां रा होदा कद टूटे, घोड़ा न कद धमकास्यूं ।
मुछ्याँ म्हारी कद बट खावै, खांडा ने कद खड़कास्यूं ।
... ... सुना पड़ग्या भुज म्हारा ए, अरियाँ नै कद जरकासी ।।
माता अब तो साँझ पड़ी है, रुस्यो दिन कद आसी ?
म्हारे जितां धरती लेग्या, चाकर आज धणी बणग्या,
दोखीडाँ रै दुःख सूं म्हारै, अन्तै में छाला पड़ग्या ।
आंसू झरती आँखड़ल्यां में, राता डोरा कद आसी ।।
माता अब तो साँझ पड़ी है, रुस्यो दिन कद आसी ?
गाठी म्हारी जीभ सुमरता, कान हुआ बोला थारै,
दिन पलट्यो जद मायड़ पल्टी, बेटा नै कुण बुचकारै ।
माँ थारो तिरशूल चलै कद, राकसडा कद आरडासी ।।
माता अब तो साँझ पड़ी है, रुस्यो दिन कद आसी ?
थारै तो लाखां बेटा है, म्हारी मायड़ इक रहसी,
हूँ कपूत जायो हूँ थारै, थनै कुमाता कुण कहसी ।
अब तो थारी पत जावै है, बाघ चढ़यां तू कद आसी ।।
माता अब तो साँझ पड़ी है, रुस्यो दिन कद आसी ?
मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011
शौर्य साक्षी सिवाना किलो अण्खलो यूं कहै आव कला राठौड़। मो सिर उतर महैंणो, तो सिर बान्ध मौड़।।
मारवाड़ के पर्वतीय दुर्गो में सिवाणा के किले का विशेष महत्व है। यह किला बाड़मेर से लगभग 160 मील दक्षिण में पर्वत शिखरो के मध्य अवस्थित है। सिवाना के इस प्राचीन दुर्ग का निर्माण वीरनारायण पंवार ने दसवी शताब्दी में करवाया... था। वह प्रतापी पंवार शासक राज भोज का पुत्र था।
उस समय पंवार बहुत शक्तिशाली थे और उनका एक विशाल क्षेत्र पर आधिपत्य था जिसमें मालवा, चन्द्रावती, जालोर, किराडू, आबू सहित अनेक प्रदेश शामिल थें। तदान्तर सिवाना जालोर के सोनगरा चौहानो के अधिकार में आ गया। ये सोनगरे बहुत वीर और प्रतापी हुए तथा इन्होने ऐबक और इल्तुतमिश सरीखे शक्तिशाली गुलामवंशी सुल्तानो का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया और अपनी स्वत्रन्त्रता अक्षुण्ण बनायी रखी लेकिन सिवाना को सबसे प्रबल चुनौति मिली सुल्तान अलाउदीन खिलजी से। अलाउदीन के आक्रमण के समय सिवाना का आधिपति सालत देव था जो जालोर के शासक कान्हड़देव का भतीजा था। सिवाणा पर अलाउदीन की सेना का पहला आक्रमण 1305 ई में हुआ। तब वीर सातल और सोम (सम्भवतः उसका पुत्र सोमेश्वर) ने कान्हड़देव की सहायकता से खिलजी सेना का डटकर मुकाबला किया। विजय की कोई आशा न देखकर खिलजी की सेना को घेरा उठाने के लिए बाध्य होना पड़ा। राजपुतो की इस प्रारम्भिक सफलता और अपनी पराजय के क्षुब्ध होकर अलाउदीन खिलजी ने 1310 ई. के लगभग स्वंय एक विशाल सेना लेकर सिवाना पर चढाई की और दुर्ग का घेरा। सातलदेव ने बड़ी वीरता के साथ उनका मुकाबला किया तथा शत्रु शिविरो पर छापामार आक्रमणों के साथ किले पर से ढेकुली यन्त्रों के द्वारा निरनतर पत्थर बरसाने और शत्रु सेना के होंसले पस्त कर दिये। लेकिन इस बार अलाउदीन सिवाना पर अधिकार करने के लिए दृढ प्रतिज्ञ था अतः उसने हर संभव उपाय का आश्रय लिया। उसने एक विशाल और ऊंची पाशीब (चबूतरा) बनवायी जिसके द्वारा खिलजी सेना दुर्ग तक पहुचने में सफल हो गयी। अलाउदीन ने वहां के प्रमुख पेयजल स्त्रोत भोडेलाव तालाब को गोमांस से दूषित करवा दिया। कहा जाता है कि इसमें भायल, पंवार नामक व्यक्ति ने विश्वासघात किया। दुर्ग की रक्षा का कोई उपाय न देख वीर सातल सोम सहित अन्य क्षत्रिय योद्वा केसरिया वस्त्र धारण कर शत्रु सेना पर टूट पड़े तथा वीरगति को प्राप्त हुए। 23वीं उल अव्वल मंगलवार को खिलजी सैनिको ने सातलदेव का क्षत-विक्षत शव अलाउदीन के सामने प्रस्तुत किया, जिसने दुर्ग को खैराबाद का नाम दिया। लेकिन अलाउदीन खिलजी की मृत्यु के साथ ही सिवाणा पर उसके वंश का आधिपत्य समाप्त हो गया। तत्पश्चात् सिवाना पर राव मल्लीनाथ राठौड़ के भाई जैतमाल और उसके वंशजों का आधिपत्य रहा। सन् 1538 में राव मालदेव ने सिवाना के तत्कालिन आधिपति राठौड़ डूंगरसी को पराजित कर इस दुर्ग पर अपना अधिकार कर लिया। मालदेव के अधिपत्य का सूचक एक शिलालेख वहां किले के भीतर आज भी विद्यमान है। राव मालदेव ने सिवाना की रक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ किया तथा वहां परकोट (शहरपनाह) का निर्माण करवाया। अपने दुर्भेद्य स्वरुप के कारण सिवाना का दुर्ग संकटकाल में मारवाड़ के राजाओं की शरण स्थली रहा। राव मालदेव ने गिरी सुमेल के युद्व के बाद शेरशाह की सेना द्वारा पीछा किये जाने पर सिवाना किले में आश्रय लिया था तद्नन्तर उनके यशस्वी पुत्र चन्द्रसेन ने सिवाना के किले को केन्द्र बनाकर शक्तिशाली मुगल बादशाह अकबर की सेनाओं का लम्बे अरसे तक प्रतिरोध किया। मुगल आधिपत्य में आने के बाद अकबर ने राव मालदेव के एक पुत्र रायमल को सिवाना दिया। लेकिन कुछ अरसे बाद ही रायमल की मृत्यृ हो गयी और सिवाना उसके पुत्र कल्याणदास (कल्ला) के अधिकार में आ गया।
इस राठौड़ वीर कल्ला रायमलोत की वीरता और पराक्रम से सिवाना को जो प्रसिद्वि और गौरव मिला उससे इतिहास के पृष्ठ आलोकित है। उक्त अवसर उस समय उपस्थित हुआ जब बादशाह अकबर कल्ला राठौड़ से नाराज हो गया और उसने जोधपुर के मोटा राजा उदयसिंह को आदेश दिया वह कल्ला को हटाकर सिवाना पर अधिकार कर ले। अकबर की नाराजगी का मामूली सी बात पर अप्रसन्न होकर बादशाह के एक छोटे मनसबदार को मार दिया था। वीर विनेद में इसका कारण दूसरा बताया गया है। उक्त ग्रन्थ के अनुसार मोटा राजा उदयसिंह ने शहजादे सलीम के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर दिया था। कल्ला इस विवाह सम्बन्ध को अनुचित एवं आपत्तिजनक मानता था और उदयसिंह से झगड़ा करता था। वास्तविक कारण चाहे जो भी रहा हो मोटा राजा उदयसिंह ने शाही सेना की सहायता से सिवाना पर आक्रमण किया। कल्ला राठौड़ ने स्वाभिमान और वीरता को उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हुए मोटा राजा उदयसिंह की सेना के साथ भीषण युद्व किया और लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की। कल्ला की पत्नी हाड़ी रानी (बूंदी के राव सुरजन हाड़ा की पुत्री) ने दूंर्ग की ललनाओं के साथ जौहर का अनुष्ठान किया। कल्ला रायमलोत की वीरता और पराक्रम से सम्बन्धित दोहे प्रसिद्व है। वीरता और शौर्य की रोमांचक घटनाओं का साक्षी सिवाना का किला काल के क्रूर प्रवाह को झेलता हुआ आज भी शान से खड़ा है।
शाका एवं जौहर
सिवाना का पहला साका 1310 में हुआ जब वीरसातालदेव और (सोमेश्वर) ने अलाउदीन खिलजी के भीषण आक्रमण का प्रतिरोध करते हुए प्राणोत्सर्ग किया तथा वीरागनाओं ने जौहर की ज्वाला प्रज्ज्वलित की। विजयी के पश्चात दुर्ग का नाम खैराबाद रखा गया।
दूसरा शाका अकबर के शासन काल में हुआ। जब मोटा राजा उदयसिंह ने शाही सेना की सहायता से सिवाना दुर्ग पर आक्रमण किया। वहां के स्वाभिमानी शासक वीर कल्ला राठौड़ ने भीषण युद्व करते हुए वीरगति पायी और महिलाओं ने जौहर किया।- रामदेवसिह बालेसर
उस समय पंवार बहुत शक्तिशाली थे और उनका एक विशाल क्षेत्र पर आधिपत्य था जिसमें मालवा, चन्द्रावती, जालोर, किराडू, आबू सहित अनेक प्रदेश शामिल थें। तदान्तर सिवाना जालोर के सोनगरा चौहानो के अधिकार में आ गया। ये सोनगरे बहुत वीर और प्रतापी हुए तथा इन्होने ऐबक और इल्तुतमिश सरीखे शक्तिशाली गुलामवंशी सुल्तानो का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया और अपनी स्वत्रन्त्रता अक्षुण्ण बनायी रखी लेकिन सिवाना को सबसे प्रबल चुनौति मिली सुल्तान अलाउदीन खिलजी से। अलाउदीन के आक्रमण के समय सिवाना का आधिपति सालत देव था जो जालोर के शासक कान्हड़देव का भतीजा था। सिवाणा पर अलाउदीन की सेना का पहला आक्रमण 1305 ई में हुआ। तब वीर सातल और सोम (सम्भवतः उसका पुत्र सोमेश्वर) ने कान्हड़देव की सहायकता से खिलजी सेना का डटकर मुकाबला किया। विजय की कोई आशा न देखकर खिलजी की सेना को घेरा उठाने के लिए बाध्य होना पड़ा। राजपुतो की इस प्रारम्भिक सफलता और अपनी पराजय के क्षुब्ध होकर अलाउदीन खिलजी ने 1310 ई. के लगभग स्वंय एक विशाल सेना लेकर सिवाना पर चढाई की और दुर्ग का घेरा। सातलदेव ने बड़ी वीरता के साथ उनका मुकाबला किया तथा शत्रु शिविरो पर छापामार आक्रमणों के साथ किले पर से ढेकुली यन्त्रों के द्वारा निरनतर पत्थर बरसाने और शत्रु सेना के होंसले पस्त कर दिये। लेकिन इस बार अलाउदीन सिवाना पर अधिकार करने के लिए दृढ प्रतिज्ञ था अतः उसने हर संभव उपाय का आश्रय लिया। उसने एक विशाल और ऊंची पाशीब (चबूतरा) बनवायी जिसके द्वारा खिलजी सेना दुर्ग तक पहुचने में सफल हो गयी। अलाउदीन ने वहां के प्रमुख पेयजल स्त्रोत भोडेलाव तालाब को गोमांस से दूषित करवा दिया। कहा जाता है कि इसमें भायल, पंवार नामक व्यक्ति ने विश्वासघात किया। दुर्ग की रक्षा का कोई उपाय न देख वीर सातल सोम सहित अन्य क्षत्रिय योद्वा केसरिया वस्त्र धारण कर शत्रु सेना पर टूट पड़े तथा वीरगति को प्राप्त हुए। 23वीं उल अव्वल मंगलवार को खिलजी सैनिको ने सातलदेव का क्षत-विक्षत शव अलाउदीन के सामने प्रस्तुत किया, जिसने दुर्ग को खैराबाद का नाम दिया। लेकिन अलाउदीन खिलजी की मृत्यु के साथ ही सिवाणा पर उसके वंश का आधिपत्य समाप्त हो गया। तत्पश्चात् सिवाना पर राव मल्लीनाथ राठौड़ के भाई जैतमाल और उसके वंशजों का आधिपत्य रहा। सन् 1538 में राव मालदेव ने सिवाना के तत्कालिन आधिपति राठौड़ डूंगरसी को पराजित कर इस दुर्ग पर अपना अधिकार कर लिया। मालदेव के अधिपत्य का सूचक एक शिलालेख वहां किले के भीतर आज भी विद्यमान है। राव मालदेव ने सिवाना की रक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ किया तथा वहां परकोट (शहरपनाह) का निर्माण करवाया। अपने दुर्भेद्य स्वरुप के कारण सिवाना का दुर्ग संकटकाल में मारवाड़ के राजाओं की शरण स्थली रहा। राव मालदेव ने गिरी सुमेल के युद्व के बाद शेरशाह की सेना द्वारा पीछा किये जाने पर सिवाना किले में आश्रय लिया था तद्नन्तर उनके यशस्वी पुत्र चन्द्रसेन ने सिवाना के किले को केन्द्र बनाकर शक्तिशाली मुगल बादशाह अकबर की सेनाओं का लम्बे अरसे तक प्रतिरोध किया। मुगल आधिपत्य में आने के बाद अकबर ने राव मालदेव के एक पुत्र रायमल को सिवाना दिया। लेकिन कुछ अरसे बाद ही रायमल की मृत्यृ हो गयी और सिवाना उसके पुत्र कल्याणदास (कल्ला) के अधिकार में आ गया।
इस राठौड़ वीर कल्ला रायमलोत की वीरता और पराक्रम से सिवाना को जो प्रसिद्वि और गौरव मिला उससे इतिहास के पृष्ठ आलोकित है। उक्त अवसर उस समय उपस्थित हुआ जब बादशाह अकबर कल्ला राठौड़ से नाराज हो गया और उसने जोधपुर के मोटा राजा उदयसिंह को आदेश दिया वह कल्ला को हटाकर सिवाना पर अधिकार कर ले। अकबर की नाराजगी का मामूली सी बात पर अप्रसन्न होकर बादशाह के एक छोटे मनसबदार को मार दिया था। वीर विनेद में इसका कारण दूसरा बताया गया है। उक्त ग्रन्थ के अनुसार मोटा राजा उदयसिंह ने शहजादे सलीम के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर दिया था। कल्ला इस विवाह सम्बन्ध को अनुचित एवं आपत्तिजनक मानता था और उदयसिंह से झगड़ा करता था। वास्तविक कारण चाहे जो भी रहा हो मोटा राजा उदयसिंह ने शाही सेना की सहायता से सिवाना पर आक्रमण किया। कल्ला राठौड़ ने स्वाभिमान और वीरता को उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हुए मोटा राजा उदयसिंह की सेना के साथ भीषण युद्व किया और लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की। कल्ला की पत्नी हाड़ी रानी (बूंदी के राव सुरजन हाड़ा की पुत्री) ने दूंर्ग की ललनाओं के साथ जौहर का अनुष्ठान किया। कल्ला रायमलोत की वीरता और पराक्रम से सम्बन्धित दोहे प्रसिद्व है। वीरता और शौर्य की रोमांचक घटनाओं का साक्षी सिवाना का किला काल के क्रूर प्रवाह को झेलता हुआ आज भी शान से खड़ा है।
शाका एवं जौहर
सिवाना का पहला साका 1310 में हुआ जब वीरसातालदेव और (सोमेश्वर) ने अलाउदीन खिलजी के भीषण आक्रमण का प्रतिरोध करते हुए प्राणोत्सर्ग किया तथा वीरागनाओं ने जौहर की ज्वाला प्रज्ज्वलित की। विजयी के पश्चात दुर्ग का नाम खैराबाद रखा गया।
दूसरा शाका अकबर के शासन काल में हुआ। जब मोटा राजा उदयसिंह ने शाही सेना की सहायता से सिवाना दुर्ग पर आक्रमण किया। वहां के स्वाभिमानी शासक वीर कल्ला राठौड़ ने भीषण युद्व करते हुए वीरगति पायी और महिलाओं ने जौहर किया।- रामदेवसिह बालेसर
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